वृद्धि एवं विकास (Growth and Development )

बाल मनोविज्ञान को जानने के लिए आवश्यक है विकास वृद्धि परिपक्वता का अर्थ समझना

अभिवृद्धि (Growth)

◆ व्यक्ति के स्वाभाविक विकास को अभिवृद्धि कहते हैं

◆ गर्भाशय में भ्रूण बनने के पश्चात जन्म होते समय तक उसमें जो प्रगतिशील परिवर्तन होते हैं वह अभिवृद्धि हैं ।

◆ अभिवृद्धि स्वतः होती है व्यक्ति में अभिवृद्धि का माप किया जा सकता है

◆ यदि अभिवृद्धि पर अधिगम अथवा अभ्यास का प्रभाव डाला जाएगा तो उसे हम विकास कहेंगे ना की अभिवृद्धि , क्योंकि अभिवृद्धि स्वतः घटित होती है।

◆ अभिवृद्धि का प्रत्यक्ष रुप से मापन किया जा सकता है , जैसे लंबाई को इंच में , भार को पौंड में इत्यादि।

◆ अभिवृद्धि केवल शारीरिक पक्ष को प्रकट करती है

अभिवृद्धि की विशेषताएं (Characteristics of Growth)

◆ वृद्धि का अर्थ – बालकों की शारीरिक संरचना जिसके अंतर्गत लंबाई ,भार, मोटाई तथा अन्य अंगों का विकास होता है

◆ वृद्धि की प्रक्रिया आंतरिक और बाह्य दोनों रूप में होती है या एक निश्चित आयु तक ही होती है।

◆ अभिवृद्धि केवल शारीरिक पक्ष को प्रकट करती है।

◆ शरीर के अंगों के रूप में परिवर्तन उनकी जटिलता और प्रकार्यों में वृद्धि।

◆ अभिवृद्धि परिमाणात्मक रूप में मापी जाती है यह मात्रात्मक परिवर्तन होता है।

◆ वृद्धि का अर्थ सामान्यतः शारीरिक एवं व्यवहारिक परिवर्तनों से है।

◆ अभिवृद्धि में व्यक्तिगत भेद होते हैं अर्थात अभिवृद्धि प्रत्येक बालक की समान नहीं होती है।

परिपक्वता (Maturity)

◆ वृद्धि की क्रिया आजीवन नहीं चलती बल्कि बालक के परिपक्व होने के बाद यह रुक जाती है।

◆ परिपक्वता आंतरिक विकास की प्रक्रिया है इसी के कारण बालक के शारीरिक अवयवों में नई क्रिया को सीखने की क्षमता उत्पन्न होती है।

◆ परिपक्वता प्राप्त होने पर अभिवृद्धि रुक जाती है, आकार में वृद्धि के अतिरिक्त शरीर में अन्य परिवर्तन होते हैं।

विकास (Development)

● विकास गर्भधान से लेकर मृत्यु पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है प्रत्येक अवस्था में विकास की गति भिन्न होती है ।

● अभिवृद्धि की अपेक्षा विकास व्यापक संप्रत्यय है।

● कार्य क्षमता की वृद्धि ही विकास है ।

● दूसरे शब्दों में, हमारी माप वृद्धि ही नहीं बल्कि विकास भी होता है।

विकास की विशेषताएं (Characteristics of development)

● शारीरिक विकास तथा मानसिक विकास आपस में धनात्मक रूप से सहसंबंधित होते हैं

● विकासात्मक परिवर्तन प्रायः व्यवस्थापरक , प्रगत्यात्मक और नियमित होते है। सामान्य से विशिष्ट, सरल से जटिल और एकीकृत से क्रियात्मक ,स्तरों की ओर अग्रसर होता है ।

● विकासात्मक परिवर्तन मात्रात्मक हो सकते हैं ,जैसे आयु बढ़ने के साथ कद बढ़ना अथवा गुणात्मक जैसे- नैतिक मूल्यों का निर्माण ।

● विकास में एक निश्चित क्रम होता है ।

● विकास की एक निश्चित दिशा एवं लक्ष्य होता है।

● विकास के पदों में समानता पाई जाती है ,किंतु इसकी दर ,सीमा तथा विभिन्नता में अंतर होता है ।

● विकास प्राणी में होने वाले परिवर्तनों का योग है यह वातावरण से भी संबंधित होता है।