दावोस 2020: क्या है वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम

21st January 2020 Off By Abdul karim

दुनियाभर के शीर्ष उद्योगपति, राजनेता और कुछ नामी चेहरे वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम में शामिल होने के लिए स्विट्ज़रलैंड के दावोस पहुंच रहे हैं.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप, जलवायु परिवर्तन के लिए आवाज़ बुलंद करने वाली किशोरी ग्रेटा थनबर्ग और उबर के मालिक दारा खोसकोवशाही का नाम भी मेहमानों की सूची में शामिल है.

भारत की बात करें तो सरकारी एजेंसियों के मुताबिक़, वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के 50वें सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की शुरुआत साल 1971 में हुई थी जिसका उद्देश्य दुनिया की स्थिति में सुधार करना है.

इसका आयोजन हर साल दावोस के अल्पाइन स्काई रिजॉर्ट में किया जाता है. इसमें उद्योगपतियों को पर्सनल मीटिंग का मौक़ा मिलता है जिससे वो अपने देश में निवेश और विभिन्न प्रकार के कारोबारी सौदे करने में कामयाब होते हैं.

हाई प्रोफ़ाइल लोग कई बार इस मंच का इस्तेमाल ग्लोबल एजेंडे की तरफ़ लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए भी करते हैं.

पिछले साल की ही बात करें तो प्रिंस विलियम ने इसी मंच से मेंटल हेल्थ का मुद्दा उठाया था. इसके अलावा सर डेविड एटनबर्ग ने इसी मंच का इस्तेमाल करते हुए लोगों को पर्यावरण के प्रति चेताया था.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम आमतौर पर लगभग 3000 लोगों का सम्मेलन है, जिसमें लगभग हर तीसरा शख़्स व्यापार जगत से ताल्लुक़ रखने वाला होता है.

इसमें शामिल होने के लिए अगर आपको न्योता मिला है तो यह सम्मेलन आपके लिए पूरी तरह मुफ़्त है. इसके अलावा अगर आप वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के सदस्य हैं तो भी आप इसमें शामिल हो सकते हैं जिसकी लागत क़रीब चार लाख अस्सी हज़ार पाउंड हो सकती है.

विश्व स्तरीय नेता, संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख नेतृत्वकर्ता और यूरोपीय संघ के ख़ास नेताओं के साथ इसमें विश्वस्तरीय कंपनियों के मालिक शामिल होते हैं.

इसके अलावा नियमित मेहमानों में अरबपति फाइनेंसर जॉर्ज सोरोस, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग और यू 2 गायक बोनो भी शामिल हैं.

हालांकि वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के नए आंकड़ों से पता चलता है कि ब्रिटेन से केवल 239 लोग ही इसमें शामिल होंगे. साल 2010 के बाद से फ़ोरम में शामिल हो रहे लोगों का ये सबसे कम आंकड़ा है.

प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का मंत्रियों को इस सम्मेलन में शामिल नहीं होने का आदेश इसका कारण माना जा रहा है.

क्या दावोस के आलोचक भी हैं ?

साल 2007-2008 में आए वित्तीय संकट तक, दावोस फ़ोरम में शामिल होने को महानता और बेहतरी से जोड़कर देखा जाता था. लेकिन कुछ आलोचकों का मानना है कि यह “वैश्विक अभिजात्य वर्ग” का प्रतीक है.

आलोचकों का मानना है कि इसमें कुछ वो लोग भी शामिल हैं जो उस संकट के लिए दोषी हैं. पिछले साल टाइम पत्रिका के संपादक आनंद गिरिधरदास ने दावोस को “मौजूदा दुनिया को तोड़ने वाले परिवार का पुनर्मिलन” कहा था.

जो लोग इस फ़ोरम में शामिल होते हैं, उन सभी के पास समान अवसर नहीं होते हैं. सबसे हाई प्रोफ़ाइल मेहमान को एक सफ़ेद बैज मिलता है जिस पर एक होलोग्राम होता है. इसे पाने वाले शख़्स को हर जगह पहुंच मिलती है.

इसके साथ ही यह पुरुष प्रधान फ़ोरम है. हालांकि पिछले साल इस सम्मेलन में क़रीब 22 फ़ीसदी महिलाएं थीं जो साल 2015 के 17 फ़ीसदी से कुछ अधिक था.

फाइनेंशियल टाइम्स के मुख्य अर्थशास्त्री कमेंटेटर मार्टिन वुल्फ़ के मुताबिक़, “अभिजात्य वर्ग हमेशा ही पहुंच से कुछ दूर होता है. वे ऐसे ही होते हैं. लेकिन सच यह भी है कि उनके बिना दुनिया का होना भी संभव नहीं है. लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि ये लोग कम से कम नियमित रूप से मिलते हैं और ये जानने की कोशिश करते हैं कि दूसरा शख़्स क्या सोच रहा है.”

दावोस फ़ोरम से हासिल क्या ?

कई कंपनियां इस मंच का इस्तेमाल स्थिरता और विविधता में सुधार जैसे मुद्दों पर अपना सहयोग सुनिश्चित करने के लिए करती हैं.

लेकिन यह फ़ोरम कुछ वास्तविक उपलब्धियों का भी उल्लेख करता है. साल 1988 में तुर्की के प्रधानमंत्री तुर्गुत ओज़ाल और ग्रीस के आंद्रेयास पापांड्रेउ के बीच हुई बैठकों ने युद्ध टालने में मुख्य भूमिका निभाई थी.

इसके अलावा साल 2000 में ‘ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन एंड इम्यूनाइज़ेशन’ ने इस सम्मेलन का इस्तेमाल लाखों बच्चों को बीमारी से मुक्त करने के लिए एक कार्यक्रम की शुरुआत करने के लिए किया था.